
महराजगंज। आलू की खेती करने वाले किसानों को लागत के मुकाबले उचित मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। खेत में फसल तैयार करने से लेकर खुदाई, मजदूरी, भंडारण और बाजार तक पहुंचाने में होने वाला खर्च किसानों की कमाई पर भारी पड़ रहा है। फरेंदा क्षेत्र के पांच कोल्ड स्टोरेज में करीब 27 हजार पैकेट आलू जमा हैं। बाजार में आलू का भाव 900 से 1,000 रुपये प्रति क्विंटल होने के बावजूद किसानों और व्यापारियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है।
फरेंदा क्षेत्र में श्रीमती रामदेई देवी, मथुरा, विशंभर, प्रेम और गंगोत्री कोल्ड स्टोरेज संचालित हैं। इनमें आलू के एक सीजन के भंडारण पर करीब 400 रुपये प्रति क्विंटल खर्च आता है। एक क्विंटल आलू के दो पैकेट बनाए जाते हैं, जिनमें प्रत्येक का वजन 50 किलोग्राम होता है।
बाजार में एक क्विंटल आलू 900 से 1,000 रुपये में बिकने पर भंडारण खर्च घटाने के बाद 500 से 600 रुपये बचते हैं। हालांकि, इस रकम में खेती की लागत, मजदूरी, आलू की खुदाई और ढुलाई का खर्च शामिल नहीं है। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद किसानों की वास्तविक बचत काफी कम रह जाती है।
आलू के भंडारण का सीजन 25 फरवरी से 31 अक्टूबर तक रहता है। इसके बाद किसान और व्यापारी कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालकर बाजार में बिक्री करते हैं। भंडारण से निकाले जाने वाले आलू का इस्तेमाल मुख्य रूप से अगली फसल की बुआई के लिए किया जाता है। वहीं, कुछ व्यापारी इसे खाने के लिए बाजार में 12 किलोग्राम की मात्रा में बेचते हैं।
तीन वर्षों से बिक्री की समस्या से जूझ रहे व्यापारी
अब्दुल मजीद ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से आलू की बिक्री में परेशानी बनी हुई है। कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालने के बाद उसे बाजार में बेचने में काफी दिक्कत होती है। खर्च की तुलना में बचत कम होने से व्यापारियों को भी नुकसान जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
किसान रविंद्र कुमार ने बताया कि भंडारण के बाद आलू बेचने से मिलने वाली रकम में खेती और अन्य खर्च जोड़ने पर हाथ में कुछ खास नहीं बचता। उनका कहना है कि यदि कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के बजाय खेत से ही बेच दिया होता, तो उसी समय 900 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बिक्री हो जाती। आलू की खेती से उचित आमदनी नहीं मिलने के कारण किसान और व्यापारी दोनों परेशान हैं। ऐसे में भंडारण, मजदूरी और परिवहन की लागत के बीच बेहतर बाजार भाव मिलना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।