
उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। राजधानी लखनऊ में राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों के बीच पोस्टर वॉर शुरू हो गया है। सड़कों और पार्टी कार्यालयों के बाहर लगे पोस्टर और होर्डिंग के जरिए एक-दूसरे पर निशाना साधा जा रहा है। इस बार पोस्टर वॉर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी चर्चा में आ गई है।
खास बात यह है कि इन पोस्टरों में राजनीतिक हमलों के साथ भगवान राम और श्रीकृष्ण जैसे धार्मिक प्रतीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कहीं मायावती के समर्थन में लाल टोपी के जरिए सपा पर कटाक्ष किया गया है तो कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को राम और कृष्ण के स्वरूप में दर्शाया गया है। लखनऊ के गोमती नगर इलाके में मायावती की तस्वीर के साथ लगाया गया एक पोस्टर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस पोस्टर पर बड़े अक्षरों में ‘दोगलों से सावधान’ लिखा गया है। इसके साथ लाल टोपी का चित्र भी लगाया गया है, जिसे समाजवादी पार्टी की पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि पोस्टर में किसी नेता का नाम लेकर सीधा आरोप नहीं लगाया गया है, लेकिन लाल टोपी के इस्तेमाल को सपा पर राजनीतिक निशाने के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा कार्यालय के बाहर भी एक पोस्टर लगाया गया है, जिस पर लिखा है- ‘जो राम को लाए थे, 27 में श्रीकृष्ण को लाएंगे।’
भाजपा कार्यकर्ता रणजीत सिंह की ओर से लगवाए गए इस पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान राम और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में दिखाया गया है। पोस्टर के जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई है।
सपा कार्यालय के बाहर भी लगी होर्डिंग, कथावाचकों पर निशाना
समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय के बाहर भी एक होर्डिंग लगाई गई है। इसमें भगवान राम और श्रीकृष्ण के नाम पर राजनीति करने वालों के साथ कथावाचकों पर सवाल उठाए गए हैं।
होर्डिंग पर लिखा है-
‘न प्रभु राम तुम्हारे हैं, न श्रीकृष्ण हमारे हैं, राम-कृष्ण तो इस संसार के प्यारे हैं। जो इनमें भेद बताए, वो कथावाचक नहीं, ढोंगी पाखंडी व्यापारी है।’
होर्डिंग लगवाने वाले सुजीत यादव का कहना है कि कथा के नाम पर व्यापार करने वाले कुछ कथावाचक देवी-देवताओं के बारे में विवादित टिप्पणियां कर रहे हैं। उन्होंने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की टिप्पणियों का विरोध करते हुए कहा कि धार्मिक आस्था के नाम पर लोगों की भावनाओं को आहत नहीं किया जाना चाहिए। बसपा का शीर्ष नेतृत्व शब्दों की मर्यादा तोड़ने वाले पोस्टरों की अनुमति नहीं देता है। हालांकि, संभव है कि किसी उत्साही कार्यकर्ता ने इस तरह के बैनर लगवाए हों। उन्होंने कहा कि सपा और भाजपा के बीच पोस्टर और होर्डिंग के जरिए राजनीतिक संदेश देने का सिलसिला पहले से चलता रहा है। अब इसमें एआई से तैयार वीडियो और दूसरी डिजिटल सामग्री का भी इस्तेमाल हो रहा है।
फिलहाल लखनऊ में लगे इन पोस्टरों को किसी भी राजनीतिक दल की आधिकारिक चुनावी घोषणा या रणनीति नहीं माना जा सकता। ये पोस्टर समर्थकों और कार्यकर्ताओं की ओर से लगाए गए हैं। हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक प्रतीकों, राजनीतिक पहचान और नारों के जरिए शुरू हुई यह पोस्टरबाजी प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन गई है।