Maharajganj News : नागपंचमी पर जागता है ‘महिषासुर’! 70 साल के बुद्धिराम को देखने उमड़ती है भीड़
20-Aug-2026
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फ़ैयाज़ अहमद
महराजगंज . नागपंचमी के दिन रुदलापुर गांव में एक ऐसी परंपरा देखने को मिलती है, जो आस्था के साथ कई सवाल भी खड़े करती है। ग्रामीणों का दावा है कि हर तीन साल में 70 वर्षीय बुद्धिराम के शरीर में ‘महिषासुर’ का प्रवेश होता है और इसके बाद वह कथित तौर पर भूसा और घास खाने लगते हैं। इस रहस्यमय घटनाक्रम को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
जिले के रुदलापुर गांव में नागपंचमी के दिन हर तीन साल में एक ऐसी घटना सामने आती है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के 70 वर्षीय बुद्धिराम के शरीर में इस दिन ‘महिषासुर’ का प्रवेश होता है। इसके बाद वे कथित तौर पर जानवरों के चारे यानी भूसा और घास खाने लगते हैं। दावा यहां तक है कि वे चार हौदियों में रखा भूसा तक खा जाते हैं।
नागपंचमी के दिन रुदलापुर गांव में आस्था का अलग ही नजारा देखने को मिलता है। बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र होते हैं और उस शख्स का इंतजार करते हैं, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि हर तीन साल में नागपंचमी के दिन उसके ऊपर ‘महिषासुर’ सवार होता है।
ग्रामीणों के मुताबिक, करीब 70 वर्षीय बुद्धिराम वर्ष 1975 से इस तरह की घटना का हिस्सा रहे हैं। उनका दावा है कि नागपंचमी के दिन उनके ऊपर ‘महिषासुर’ की सवारी आती है। इसके बाद वे सामान्य व्यवहार से अलग होकर जानवरों के लिए रखे गए भूसे और घास को खाने लगते हैं।
बताया जाता है कि गांव में स्थित समय माता मंदिर में पूजा-पाठ के दौरान यह घटनाक्रम शुरू होता है। इसके बाद बुद्धिराम कथित तौर पर नाद में रखे पानी के साथ भूसा और घास खाने लगते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मौके पर मौजूद रहते हैं।
कुछ लोग बुद्धिराम को अपने हाथों से केला, घास, भूसा और लड्डू खिलाते नजर आते हैं। ग्रामीणों में ऐसी मान्यता भी है कि यहां मांगी गई मनौतियां पूरी होती हैं। इसी विश्वास के चलते नागपंचमी पर यहां लोगों की भीड़ जुटती है।
हालांकि, इन दावों की कोई वैज्ञानिक पुष्टि सामने नहीं आई है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल आस्था के नजरिए से देखने के बजाय वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जांच के नजरिए से देखना भी जरूरी है।
क्या यह किसी तरह की धार्मिक मान्यता है? क्या यह अंधविश्वास है? या फिर इसके पीछे कोई दुर्लभ मानसिक अथवा व्यवहार संबंधी चिकित्सकीय स्थिति हो सकती है? इन सवालों का जवाब विशेषज्ञों की जांच के बाद ही सामने आ सकता है।
नागपंचमी पर रुदलापुर में सामने आने वाला यह घटनाक्रम आज भी कई सवाल खड़े करता है। ग्रामीण इसे आस्था और ‘महिषासुर’ से जोड़कर देखते हैं, जबकि विज्ञान के नजरिए से इसकी प्रमाणिकता की जांच जरूरी है। हमारा उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि दावों और हकीकत के बीच का फर्क समझना है।