नई दिल्ली। स्टूडेंट प्रोटेस्ट समाप्त होने के बाद अभिनेता अनुपम खेर ने आंदोलन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन विरोध के दौरान शब्दों की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
अनुपम खेर ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा करते हुए लिखा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत लोगों की आवाज है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उनकी भाषा है। उन्होंने कहा कि यह संदेश किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उस संस्कृति के समर्थन में है जहां विचारों का संघर्ष हो सकता है, लेकिन शब्दों का पतन नहीं होना चाहिए।
अनुपम खेर ने वीडियो पोस्ट के कैप्शन में लिखा है, ‘लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हमारी आवाज है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती हमारी भाषा है। असहमति जरूरी है। सवाल पूछना भी जरूरी है। सरकारों को जवाबदेह बनाना भी जरूरी है। लेकिन अगर हम अपनी भाषा की मर्यादा खो देंगे, तो हमारी बात की ताकत भी कम हो जाएगी। यह वीडियो किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है।
यह उस संस्कृति के पक्ष में है जहां विचारों का संघर्ष हो सकता है, लेकिन शब्दों का पतन नहीं। मतभेद रखें, लेकिन मर्यादा भी रखें। क्योंकि एक सभ्य समाज की पहचान केवल उसके विचारों से नहीं, बल्कि उन्हें व्यक्त करने के तरीके से भी होती है। जय हिन्द। वंदे मातरम।’
वीडियो में उन्होंने कहा, ‘आंदोलन खत्म हो गया, बहुत सी बातें स्पष्ट हो गईं। ये भी साबित हो गया कि छात्र अपनी बात ईमानदारी से रखता है, तो लोकतंत्र उसे सुनता है।’
आगे उन्होंने कहा, ‘इस पूरे आंदोलन में एक घटना ने हम सबको भीतर तक दुखी किया है। कैमरों के सामने मंचों के सामने जिस तरह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपमानजनक और अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया गया, उसे देखकर मन व्यथित हुआ। ये किसी एक व्यक्ति का नहीं उस संस्कृति का प्रश्न है जिसे हम आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़कर जाना चाहते हैं।’
आगे एक्टर ने कहा, ‘हम किसी भी नेता से असहमत हो सकते हैं, उनकी नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, उनसे सवाल पूछ सकते हैं, यही लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन जब तर्क समाप्त हो जाते हैं और गालियां शुरू हो जाती हैं, तो बहस नहीं बचती, सिर्फ शोर बचता है। श्री नरेंद्र मोदी पिछले 30 सालों से सार्वजनिक जीवन में हैं, देश की जनता ने उन्हें बार-बार अपना विश्वास दिया है। हम उनके हर निर्णय से सहमत हों, ये आवश्यक नहीं है, लेकिन किसी भी निर्वाचित मंत्री के पद की गरिमा का सम्मान करना हम सबका दायित्व है।’
अपने संदेश के अंत में अभिनेता ने कहा कि दुख विरोध का नहीं, बल्कि विरोध की गिरती हुई भाषा का है। उन्होंने कहा कि जब बड़े ही मर्यादा भूल जाएंगे तो आने वाली पीढ़ियों से बेहतर व्यवहार की उम्मीद करना कठिन होगा। उन्होंने लोगों से लोकतंत्र में सवाल पूछने के साथ-साथ भाषा की गरिमा बनाए रखने की अपील की।
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