Bamboo Farming In Maharajganj : बंजर जमीन से लाखों की कमाई! महराजगंज के किसान ने बांस की खेती से बदली किस्मत
30-Mar-2026
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Bamboo Farming In Maharajganj : हमारा भारत देश एक कृषि प्रधान देश माना जाता है। क्योंकि यहाँ ज्यादातर लोग कृषि या फिर इससे जुड़े व्यवसाय करते हैं। साथ ही साथ यहाँ एक बड़ी संख्या उन किसानों की है, जो पारंपरिक खेती जैसे धान, गेहूं, गन्ना और अन्य मौसमी फसलों की खेती करते हैं।
इसके साथ ही खेती के क्षेत्र में किसान धीरे-धीरे पारंपरिक फसलों की खेती के साथ अन्य दूसरे खेती की विकल्पों की ओर भी आगे बढ़ रहे हैं। इन्हीं में से एक है बांस की खेती, जो कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल के रूप में किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है।
बांस की खेती की बात करें तो इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि यह एक ऐसी खेती है जिसे ऐसी भूमि पर भी उपजाया जा सकता है। जहां अच्छी फसल ना होती हो यानी कि इसे बंजर जमीन पर भी उपजाया जा सकता है। अन्य दूसरे फसल जहां बंजर जमीन पर कोई उपज नहीं देती हैं तो वहीं इसकी खेती से उस जमीन का सदुपयोग भी किया जा सकता है। बांस की खेती एक ऐसे ही नए विकल्प के रूप में सामने आया है जो सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए एक बेहतरीन खेती है।
महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के किसान हृदय नारायण दुबे जिन्होंने बस की खेती की है बताया कि मुझे नहीं लगता कि बांस की खेती के लिए बहुत ज्यादा प्रशिक्षण लेने की जरूरत है। वैसे भी आप जाएंगे तो आप सामान्यतः देखेंगे तो हर जगह बांस पाया जाता है। भारत में बांस की बहुत सारी प्रजातियां होती हैं। उन्होंने बताया कि हमने जो बांस की खेती की है उसे भीमा बास कहते हैं जो बंबुआ बालकुआ प्रजाति का बांस है।
यह बांस काफी मोटा होता है और इसके अंदर लुगदी भी ज्यादा होती है। इसके साथ ही इसका वजन भी अधिक होता है। यह अस्सी से नब्बे फीट तक का लंबा होता है और इस बांस को मैच्योर होने में पांच से सात साल का समय लगता है और मैच्योर होने के बाद इसकी हार्वेस्टिंग होती है। उन्होंने बताया कि तीन हजार के आसपास पौधे हमने लगाए थे, लेकिन ज्यादा बारिश होने की वजह से पांच सौ के आसपास पौधे खराब हो गए।
वर्तमान समय में उनके पास लगभग पच्चीस सौ पौधे अच्छी स्थिति में है जिनको हृदय नारायण दुबे ने हाई डेंसिटी फार्मिंग के रूप में लगाया है। एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच की दूरी चार बाई चार फीट की है तो वहीं दो क्यारियों के बीच की दूरी दस फीट की है।
पौधों के बीच की निश्चित दूरी इसके हरवेस्टिंग में मदद करती है और निकालने में भी आसानी होती है। उन्होंने अन्य जगहों पर भी बास की खेती की है, जिसको वह लोकल में दो सौ रुपए प्रति बांस के हिसाब से बेच देते हैं।
उन्होंने बताया कि मेरे पास पच्चीस सौ पौधे हैं जिनसे दो से तीन बांस तैयार होते है और ऐसे में उनसे यदि दो बांस ही तैयार हो तो पांच हजार बांस भी तैयार होता है तो मैं बल्क में आधे दाम पर भी सौ रुपए प्रति बास के हिसाब से भी बेचता हूं तो मुझे प्रति वर्ष पांच लाख का मुनाफा होगा वो भी बिना उसमें कुछ डाले मुझे हर साल पांच लाख रुपए का मुनाफा होगा।