Bawan Kuan History Maharajganj : भारत-नेपाल सीमा के पास दफन है 52 कुओं का रहस्य, आज भी नहीं जानते लोग पूरी कहानी

    16-Jun-2026
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शिवानी

Bawan Kuan History Maharajganj : भारत नेपाल सीमा से सटे महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र के इटहिआ में स्थित 'बावन कुएं' आ भी इतिहास और लोककथाओं की एक अनोखी विरासत को अपने भीतर समेटे हुए हैं। कभी थारू समाज की जीवनरेखा रहे यह कुएं धीरे धीरे अब मिट्टी में विलुप्त होते जा रहे हैं। समय के साथ इनका अस्तित्व धुंधला पड़ता जा रहा है, लेकिन इनसे जुड़ी कहानियां आज भी लोगों को अतीत की झलक दिखाती हैं।

बावन कुओं के पास एक मंदिर के स्थानीय पुजारी बुद्धू महाराज बताते हैं कि यह इलाका कभी बावनगढ़ी, इटौरा नगर और रामपुरवा गांव के नाम से प्रसिद्ध था। यहां के कुओं का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि यहां बावन गढ़ी में बावन कुएं देखने को मिलते हैं। तत्कालीन समय में पेयजल और घरेलू जरूरतों के लिए यहाँ बड़ी संख्या में कुओं का निर्माण कराया गया था। थारू समाज के लोग इन कुओं के माध्यम से अपने जरूरत का जल निकालते थे। खेतीबाड़ी से लेकर अपने रोजमर्रा के काम वे इन्ही कुओं के जल से पूरा करते थे।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक समय थारू समाज की कितनी बड़ी आबादी यहाँ निवास करती थी। कहा जाता है कि पूरे क्षेत्र में कुल 52 कुएं थे, जिनकी वजह से इस स्थान को ‘बावन कुएं’ के नाम से पहचान मिली।


उन्होंने बताया कि समयांतर के साथ धीरे धीरे विकास हुआ तो थारू समाज के लोगों ने हैंडपंप और अन्य आधुनिक सुविधाओं का प्रयोग करने लगे। परिणामस्वरूप अधिकांश कुएं मिट्टी से भर गए और कई पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं। अब केवल कुछ ही कुएं ऐसे हैं, जिनके अवशेष धरातल पर दिखाई देते हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बावन कुओं का संबंध नेपाल के थारू समुदाय से सदियों से जुड़ा हुआ है। भले ही अब इन कुओं का अस्तित्व न रहा हो और यह उपेक्षा का शिकार हो लेकिन इसके बावजूद भी यह तत्कालीन समय के इतिहास को अपने अंदर समेटे हुए हैं। थारू समाज एक लंबे समय से तराई क्षेत्र में रहता आया है और अपने एक अलग संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली के लिए भी जाना जाता है।

जो कुएं आज जमीन में लुप्त हो चुके हैं वह कभी थारू समुदाय के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे। कभी उनके जरूरत के पेयजल, घरेलू जरूरत की आपूर्ति और अन्य दूसरे जरूरत के लिए एक अहम हिस्सा हुआ करते थे।

इतिहासप्रेमियों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इन कुओं के संरक्षण की दिशा में पहल नहीं की गयी तो आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल विरासत को केवल कहानियों में ही सुन पाएंगी।