महराजगंज। जनपद में स्वीकृत पदों के मुकाबले लेखपाल और राजस्व निरीक्षकों की तैनाती कम होने से राजस्व विभाग का कामकाज प्रभावित हो रहा है। कर्मचारियों की कमी का सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र बनवाने से लेकर जमीन की पैमाइश तक के लिए लोगों को महीनों और कई मामलों में वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
राजस्व विभाग की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, जनपद में 107 लेखपालों की कमी है। यहां लेखपालों की कुल स्वीकृत पदों की संख्या 368 के सापेक्ष 261 की ही तैनाती है। यानि जनपद में करीब 31 फीसदी लेखपालों के पद रिक्त हैं। लेखपालों के साथ राजस्व निरीक्षकों यानी कानूनगो की भी कमी है। जिले में राजस्व निरीक्षकों के 50 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 28 की तैनाती है। यानी 22 पद रिक्त हैं। स्वीकृत पदों की तुलना में करीब 44 प्रतिशत पद खाली हैं।
इसका असर धारा 24 के तहत न्यायालय से पत्थर नसब के आदेश के बाद होने वाली कार्रवाई पर भी पड़ रहा है। राजस्व निरीक्षक की जरूरत वाले मामलों में लोगों को समय पर कार्रवाई के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
इसका कारण यह है कि राजस्व निरीक्षकों के जनपद में स्वीकृत पदों की तुलना में लगभग आधे ही तैनात हैं। जनपद में 50 राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) के स्वीकृत पद के सापेक्ष केवल 28 की तैनाती है। यानी कानूनगो के 22 पद रिक्त पड़े हैं। यह स्वीकृत पदों की तुलना में 44 फीसदी है।
उत्तर प्रदेश में लेखपाल ग्रामीण स्तर पर राजस्व विभाग का एक प्रमुख स्थानीय अधिकारी होता है। वह गांव और तहसील के बीच एक अहम कड़ी के रूप में काम करता है। अपने क्षेत्र (हल्के) की जमीन और कृषि से जुड़े रिकॉर्ड रखना उसकी मुख्य जिम्मेदारी होती है।
इसके अलावा लेखपालों के काम में भू-अभिलेखों का रखरखाव करना, खसरा और खतौनी जैसे जमीन के सभी जरूरी दस्तावेजों को अपडेट रखना, जमीन के मालिकाना हक का रिकॉर्ड संभालना, फसल की बुवाई और उत्पादन का डेटा समय-समय पर तैयार करना, भूमि पैमाइश और सत्यापन, जमीन के बंटवारे या सीमा विवाद के मामलों में पैमाइश (नाप) करना शामिल है।
आय, जाति और निवास प्रमाणपत्रों के लिए आवेदन करने वाले लोगों को भी कर्मचारियों की कमी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इन प्रमाणपत्रों के लिए लेखपालों द्वारा जांच और स्थलीय सत्यापन किया जाता है। कर्मचारियों की कमी के कारण कई लोगों को प्रमाणपत्र बनवाने में चार से पांच महीने तक का समय लग रहा है।
इसके अलावा बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि और आगजनी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में फसल नुकसान का सर्वे करना, रिपोर्ट तैयार करना, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान और अन्य राजस्व संबंधी कार्य भी लेखपालों के जिम्मे हैं। ऐसे में रिक्त पदों के कारण काम का बोझ बढ़ने से विभागीय कार्यों की गति प्रभावित हो रही है।
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