महराजगंज। नगर पालिका परिषद सिसवा बाजार के वार्ड संख्या-25 मीराबाई नगर स्थित निर्माणाधीन अमृत सरोवर 2.0 (छठ घाट पोखरा) में तीन मासूम बच्चों की डूबकर हुई मौत के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया है। जिलाधिकारी द्वारा गठित जांच समिति ने मौके पर पहुंचकर स्थलीय निरीक्षण किया। इस दौरान मृतक बच्चों के परिजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने निर्माण प्रक्रिया, सुरक्षा व्यवस्था और सरकारी धन के उपयोग को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए।
निरीक्षण के दौरान कई बार माहौल तनावपूर्ण हो गया। लोगों का कहना था कि हादसे के बाद जांच शुरू की गई, जबकि निर्माण कार्य के दौरान जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी मौके पर पहुंचकर सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा नहीं की।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राज्य वित्त योजना के तहत 22 जून 2026 को टेंडर खोला गया और उसी दिन कार्यादेश भी जारी कर दिया गया, जबकि मौके पर निर्माण कार्य पहले से काफी हद तक पूरा दिखाई दे रहा था।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि काम पहले से चल रहा था तो टेंडर और कार्यादेश की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी की गई। साथ ही अवर अभियंता (जेई) द्वारा आगणन तैयार करने से पहले स्थल निरीक्षण किए जाने पर भी सवाल खड़े किए गए।
जांच के दौरान अधिशासी अधिकारी, अवर अभियंता, नगर पालिका अध्यक्ष और अध्यक्ष प्रतिनिधि की भूमिका पर भी सवाल उठे। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना था कि यदि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने निर्माण स्थल का निरीक्षण किया था तो बच्चों की सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड या अन्य सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए गए। उन्होंने आरोप लगाए कि आबादी के बीच स्थित निर्माणाधीन पोखरे को बिना सुरक्षा व्यवस्था के छोड़ना गंभीर लापरवाही है।
टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल
स्थानीय लोगों ने इंटरलॉकिंग निर्माण के भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि यदि कार्य का भुगतान किया जा चुका है तो मौके पर निर्माण कार्य क्यों नहीं दिखाई दे रहा। उन्होंने जांच समिति से भुगतान संबंधी अभिलेखों और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की। मृतक बच्चों के परिजनों ने कहा कि इसे केवल हादसा मानकर मामला दबाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने जांच को निष्पक्ष बनाते हुए दोषी अधिकारियों और संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
नगर पालिका का पक्ष
नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि गिरजेश जायसवाल ने कहा कि नगरपालिका क्षेत्र में 100 से अधिक पोखरे हैं, जिनमें 35 से 40 निजी हैं। ऐसे में सभी पोखरों पर बैरिकेडिंग कराना संभव नहीं है। हालांकि, उनके इस बयान के बाद यह सवाल और गहरा गया कि यदि किसी सरकारी योजना के तहत घनी आबादी में चल रहे निर्माण कार्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है।
रिपोर्ट का इंतज़ार
जिलाधिकारी की ओर से गठित समिति को निर्धारित समय में रिपोर्ट सौंपनी है। अब लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि रिपोर्ट में निर्माण प्रक्रिया, टेंडर, सुरक्षा इंतजाम और संभावित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर क्या निष्कर्ष सामने आते हैं। तीन मासूमों की मौत के बाद यह मामला अब सिर्फ हादसा नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है।
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